जानिए क्या है पुलिस कमिश्नर सिस्टम, कैसे मजबूत होगी कानून-व्यवस्था

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Uttar Pradesh Police

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और एनसीआर क्षेत्र के गौतमबुद्धनगर में पुलिस आयुक्त प्रणाली को लागू कर उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐतिहासिक पहल की है। इससे यूपी की कानून व्यवस्था में निश्चित तौर सुधार होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि पुलिस महकमे के लिये यह फैसला उम्मीद से बढ़कर है, क्योंकि कैबिनेट ने न केवल दो बड़े शहरों में आयुक्त प्रणाली को लागू किया है, बल्कि पुलिस को कई सारी शक्तियां भी प्रदान की हैं। आयुक्त प्रणाली से आम आदमी के लागू होने से आम जनता को त्वरित न्याय मिल सकेगा।

इस फैसले पर खुशी जताते हुए यूपी के पुलिस महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि अभी तक पुलिस को प्रशासन पर निर्भर रहकर काम करना होता था, लेकिन जिस तरह से शहरीकरण बढ़ रहा है, अपराध के तरीके और आयाम बदल रहे हैं। ऐसे में त्वरित निर्णय लेने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसके मद्देनजर हमने माना कि पुलिस आयुक्त प्रणाली बिल्कुल उपयुक्त है।

1977 में की गई थी सिफारिश

1977 में धरमवीर कमीशन (तीसरा राष्‍ट्रीय पुलिस आयोग) ने पुलिस कमिश्‍नर सिस्‍टम लागू करने की सिफारिश की थी। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यूपी में यह प्रणाली लागू नहीं हो पायी थी। कई सरकारें आयीं, कई चली गईं, लेकिन आपसी टकराव की वजह से फाइल आगे नहीं बढ़ पायी। आईएएस संवर्ग को यह लगा कि इससे उनके अधिकारों में कटौती हो जाएगी। हालांकि पूर्व सीएम राम नरेश यादव ने प्रदेश में कमिश्नर सिस्टम लागू कर वासुदेव पंजानी को कानपुर का पुलिस कमिश्नर नियुक्त किया था, लेकिन उनके काम शुरू करने से पहले ही प्रणाली को वापस ले लिया गया। उसके बाद इसे लागू करने की फाइल ठंडे बस्ते में चली गई।

लखनऊ और गौतमबुद्धनगर ही क्यों?

पुलिस कमिश्‍नर की नियुक्ति शहर की जनसंख्‍या के हिसाब से की जाती है। लखनऊ की जनसंख्‍या 2011 के सेंसस के अनुसार 29 लाख थी, जो बढ़कर 40 लाख के करीब हो गई है, वहीं गौतमबुद्धनगर की संख्‍या जो 16 लाख थी, अब 25 लाख हो गई है। लिहाज़ा इन शहरों में कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिये कमिश्‍नर सिस्टम की जरूरत महसूस हुई और मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निर्णय ले लिया।

पुलिस की शक्तियों में इज़ाफा

  • अब दंगाइयों, उपद्रवियों पर बल प्रयोग करने के लिए पुलिस को को अब जिला मजिस्ट्रेट का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
  • अब जो दंगा करेगा, उपद्रव करेगा, आमजन और पुलिस पर हमला करेगा, सार्वजनिक संपत्तियों को बर्बाद करेगा, उसके खिलाफ सीधी कार्रवाई की शक्तियां पुलिस के पास होंगी।
  • आयुक्त प्रणाली के साथ पुलिस में भी अब सिंगल विंडो सिस्टम लागू होगा।
  • अब गुडों, माफियाओं, सफेदपोशों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई के लिए पुलिस मजिस्ट्रेट की अनुमति का इंतजार नहीं करना होगा।
  • अपराधियों, माफियाओं और सफेदपोशों के असलहों के लाइसेंस कैंसिल करने के लिए भी पुलिस के पास सीधे अधिकार होंगे।
  • 151 और 107, 116 जैसी धाराओं में पुलिस को गिरफ्तार कर सीधे जेल भेजने का अधिकार होगा।

कहां-कहां है कमिश्‍नर सिस्टम?

देश के 15 राज्यों के 71 शहरों में कमिश्‍नर सिस्‍टम लागू है। जिनमें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरू, अहमदाबाद, राजकोट, बड़ौदा, हैदराबाद, त्रिवेंद्रम आदि शामिल हैं, वहां ये सिस्टम लागू है और बेहतर कार्य कर रहा है।

क्या कहते हैं पूर्व पुलिस अधिकारी?

उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक आई. सी. द्विवेदी का कहना है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्‍य में पुलिस आयुक्त प्रणाली बहुत पहले लागू हो जानी चाहिये थी। मगर, हितों का टकराव होने और राजनीतिक इच्‍छाशक्ति की कमी की वजह से यह नहीं लागू हो सकी थी। उन्होंने कहा कि सरकार ने देर आयद, दुरुस्‍त आयद की तर्ज पर इस पुलिसिंग प्रणाली को हरी झंडी देकर अच्‍छा काम किया है। इससे पुलिस को काम करने की आजादी मिलेगी और उसकी जवाबदेही भी बढ़ेगी।

पूर्व में प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रह चुके रंजन द्विवेदी ने कहा कि अंग्रेजों की बनायी शासन प्रणाली में तब्‍दीली की गुंजाइश लगभग ना के बराबर थी। उत्‍तर प्रदेश भी काफी हद तक उसी ढर्रे पर चल रहा है। ऐसे में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करना सरकार का अच्‍छा कदम है। उन्‍होंने कहा कि अफसरशाही खुद ही कोई बदलाव नहीं चाहती है। क्‍योंकि परिवर्तन होने से अधिकारों का कुछ हद तक अंतरण हो जाता है और अफसरशाही की तंत्र पर वैसी पकड़ नहीं रह जाती। दिल्‍ली में जब पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू हुई तो उसका खासा विरोध किया गया था। कोई भी बदलाव होता है तो एक पक्ष को लगता है कि उसका नुकसान होगा।

द्विवेदी ने कहा कि आयुक्त प्रणाली लागू होने से खासे फायदे होंगे। शहर जितना बड़ा होगा, समस्‍याएं भी उतनी ही विकट होंगी। गांव में जो समस्‍या एक दिन में फैलेगी, वह शहर में एक घंटे में ही फैल जाएगी। ऐसे में यह जरूरी है कि तुरंत निर्णय लेने की एक व्‍यवस्‍था हो। द्विवेदी ने कहा कि अंग्रेजों ने भारत में पुलिस की जो प्रणाली लागू की, वह आयरलैंड जैसी थी। उसमें पुलिस का सिर्फ इस्‍तेमाल किया जाता था, उसे निर्णय लेने के कोई अधिकार नहीं दिये जाते थे। लखनऊ और गौतमबुद्धनगर जिलों में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने का फैसला इस गलती के सुधार की दिशा में उठाया गया अहम कदम है।

पुलिस महानिरीक्षक रह चुके सेवानिवृत्‍त आईपीएस अफसर एस. आर. दारापुरी ने कहा कि आज से करीब 25 साल पहले एक घोषणा की गयी थी कि कानपुर में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू होगी और वी. पी. पंजानी पहले पुलिस आयुक्‍त होंगे, मगर रातोंरात एक लॉबी ने मिलकर सरकार को अपना फैसला वापस लेने पर मजबूर कर दिया था। उन्‍होंने बताया कि पुलिस आयुक्‍त प्रणाली लागू होने से सम्बन्धित जिले में पुलिस को मजिस्‍ट्रेट के अधिकार मिल जाते हैं। जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी की मजिस्‍ट्रेट वाली शक्तियां पुलिस के हाथ में आ जाती हैं। जिलाधिकारी के पास केवल राजस्‍व और विकास सम्‍बन्‍धी शक्तियां रह जाती हैं।

दारापुरी ने कहा कि पुलिस के पास अधिकार आ जाने से एक तरह सिंगल विंडो सिस्‍टम लागू हो जाता है और काम सुगमता से होता है। इससे पुलिस को अपना काम करने की आजादी मिलती है और उसे विभिन्‍न प्रक्रियाओं के लिये प्रशासनिक अफसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। उन्‍होंने भी कहा कि राजनीतिक इच्‍छाशक्ति की कमी की वजह से ही उत्‍तर प्रदेश में पुलिस आयुक्‍त प्रणाली लागू होने में इतनी देर हुई। राजनेता और अफसर अब तक लागू रही प्रणाली के सबसे बड़े लाभार्थी होते हैं और वे पुरानी प्रणाली को ही लागू रखने की कोशिश करते रहे।

New Delhi | PBNS Bureau