दीनदयाल उपाध्याय- हर वर्ग के उत्थान के लिए समर्पित किया संपूर्ण जीवन

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पंडित दीनदयाल उपाध्याय नाम से आप जरुर परिचीत होंगे क्योंकि हाल ही में उत्तर प्रदेश में स्थित मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन कर दिया गया है। दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर कई योजनाएं भी चल रही हैं।

दीनदयाल उपाध्याय के जन्म शताब्दी समारोह का शुभारंभ करते हुए केरल में पीएम मोदी ने कहा था की   “दीनदयाल उपाध्याय कहते थे कि अगर समानता हासिल करनी है, तो ऊंचे स्तर पर लोगों को झुकना होगा और उन लोगों का समर्थन करना होगा जिनका शोषण और किनारा किया गया है।

पीएम मोदी ने यह भी कहा कि दीनदयाल उपाध्याय मुसलमानों और दलितों के उत्थान की बात करते थे। “पचास साल पहले, दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि मुसलमानों को अलग नहीं माना जाना चाहिए। उन्हें न ही पुरस्कृत करें और न ही फटकारें बल्कि उन्हें सशक्त बनाएं। मुसलमानों को नीचा नहीं देखा जाना चाहिए और न ही उन्हें केवल एक वोट बैंक के रूप में देखा जाना चाहिए। दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को साझा करते हुए पीएम ने कहा कि वो “आपका अपना है।” आइए जानते हैं एक महान विचारक और एक राजनेता दीन दयाल उपाध्याय के बारे में…

दीनदयाल उपाध्याय के नाम से योजनाएं:

  • दीनदयाल अंत्योदय योजना
  • दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना (DDU-GKY)
  • पंडित दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते कर्यक्रम
  • दीनदयाल उपाध्याय स्वानियोजन योजना (DUSY)
  • दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना

सामाजिक कार्य दीनदयाल उपाध्याय के प्रमुख दर्शन

  • एकात्म मानववाद – दीनदयाल उपाध्याय को “एकात्म मानववाद” के उनके सिद्धांत के लिए याद किया जाता है, जिसे “एक वर्गहीन, जातिविहीन और संघर्ष-मुक्त सामाजिक व्यवस्था” के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • यह देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने के साथ स्वदेशी “भारतीय संस्कृति” के एकीकरण की बात करता है।
  • यह मानव कल्याण का एक समग्र विचार प्रदान करता है।
  • यह भौतिकवाद, आध्यात्मिकता और सतर्क इच्छा के संश्लेषण को बढ़ाता है, क्योंकि प्रत्येक की खुशी प्राप्त करने में भूमिका होती है।
  • और एक आर्थिक सूचकांक संतुष्टि या खुशी का एकमात्र उपाय नहीं हो सकता है।

राजनीतिक कार्य और जनसंघ की नींव रखी

  • साल 1951 में भारतीय जनसंघ की नींव रखी गई थी और इस पार्टी को बनाने का पूरा कार्य दीनदयाल उपाध्याय ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर किया था। जनसंघ के गठन के बाद दीनदयाल उपाध्याय को पार्टी का महासचिव भी चुना गया था। 1977 में भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गाया  ौस्का नाम से जनता पार्टी हो गया , बाद में जनता पार्टी से अलग हो कर  1980  नया  दाल  बना जिसका  नाम भारतीय जनता पार्टी रखा गया

जीवन परिचय

  •  किताबों और पत्रिकाओं में दीनदयाल उपाध्याय के बारे में बहुत कुछ जानने को नहीं मिलता। लेकिन बीजेपी और आरएसएस उन्हें महात्मा गांधी की तरह एक दूरदर्शी नेता मानते हैं। एक ऐसे शख्स जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में पहला स्थान हासिल करने के बाद भी, दीनदयाल उपाध्याय सरकारी सेवा में नहीं शामिल हुए बल्कि 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आजीवन स्वयंसेवक बन गए।दरअसल दीनदयाल उपाध्याय उन दिनों आरएसएस नेता नानाजी देशमुख और भाऊ जुगाडे से काफी प्रभावित थे। दोनों नेता आगरा में तक काफी सक्रिय थे। यूपी के कई जिलों में संघ में रहते हुए  सेवा करते हुए दीनदयाल उपाध्याय ने लखनऊ में एक पब्लिकेशन हाउस राष्ट्र धर्म प्रकाशन की स्थापना की और राष्ट्र धर्म नाम की एक पत्रिका का शुभारंभ किया। बाद में, उन्होंने एक दैनिक स्वदेश और साप्ताहिक पांचजन्य की शुरुआत की जो अब आरएसएस का मुखपत्र है। इसके अलावा इन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य पर एक नाटक भी लिखा था और शंकरचार्य के जीवन पर एक किताब भी लिखी थी।

आरंभिक जीवन (25 सितंबर 1916-11 फरवरी 1968)

  •  दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर1916में मथुरा में हुआ था। लेकिन मात्र आठ साल की उम्र तक उनके सिर से मां-बाप का साया उठ चुका था। एक अनाथ थे और दुख और संघर्ष में अपना जीवन व्यतीत करते थे। लेकिन एक होनहार छात्र के रूप में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और सिविल सेवा परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उन्ही दिनों एक किस्सा हुआ। दरअसल परंपरा के अनुरुप धोती-कुर्ता और टोपी पहन कर वह हुए परीक्षा देने पहुंचे। तभी से उन्होंने पंडित जी के रूप में अपना उपनाम प्राप्त किया। देश भर में भ्रमण करते हुए उन्होंने देश में अनत्योदय यानी आखिरी व्यक्ती के उत्थान की बात करते। जिसे बाद में बीजेपी की सरकार आने पर तमाम योजनाओं को उनके नाम से शामिल किया।
  • दीनदयाल उपाध्याय को एक दार्शनिक के तौर पर देखें तो “संपूर्ण मानववाद” के उनके सिद्धांत के लिए याद किया जाता है, जिसमें “एक वर्गहीन, जातिविहीन और संघर्ष-मुक्त सामाजिक व्यवस्था” के रूप में परिभाषित किया गया है। जो देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने के साथ स्वदेशी “भारतीय संस्कृति” के एकीकरण की बात करता है।उपाध्याय के अनुसार धर्म शांति और समृद्धि लाता है। हालांकि कुछ आलोचकों ने उनके आदर्शों को मुसलमानों के विरोधी और पक्षपाती बताया। दूसरी ओर भाजपा का मानना है कि दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन को नए सिरे से व्याख्या की आवश्यकता है। भाजपा शासित कुछ राज्यों ने दीनदयाल उपाध्याय को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किया है।

मृत्यु बना रहस्य

दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु 11 फरवरी 1968 को हुई। लेकिन उनकी मृत्यु एक रहस्य बनी हुई है। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन द्वारा दीनदयाल उपाध्याय को समर्पित एक वेबसाइट के अनुसार, 11 फरवरी 1968 को सुबह करीब 3.45 बजे, मुगलसराय स्टेशन के लीवरमैन ने सहायक मास्टर को सूचित किया कि स्टेशन से लगभग 150 गज की दूरी पर, रेलवे लाइन के पास, एक शव पड़ा था। “इस शरीर की पहचान बाद में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय के रूप में की गई। जो लखनऊ से सवार होकर एक ट्रेन से पटना जा रहे थे।दीनदयाल उपाध्याय की इस तरह मौत पर उन दिनों राजनीति भी काफी हुई। मृत्यु की जांच के लिए कई बार जांच टीम बनाई गई। अदालत में केस भी चला। लेकिन आज भी उनकी मौत की रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका।

New Delhi | PBNS Bureau