भारत और अमेरिका की खट्टी—मीठी दोस्ती

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हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान ट्रंप ने दावा किया कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर मसले पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने का आग्रह किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि यदि भारत और पाकिस्तान दोनों देश चाहते हैं कि वह कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करें तो वह तैयार हैं। डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान के बाद भारत, अमेरिका और पाकिस्तान तीनों देशों में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई। भारत में तो कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियों ने इसपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जवाब मांग लिया। मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद के दोनों सदनों में इस पर जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी भी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कश्मीर मामले में भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने को नहीं कहा। इसके बाद सवाल उठने लगे कि प्रधानमंत्री मोदी के ‘दोस्त’ ने ऐसा झूठ क्यों बोला?

प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच की दोस्ती जगजाहिर है। जबसे ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं तबसे पीएम मोदी और उनके बीच 5—6 बार मुलाकात हुई है। हर मुलाकात के दौरान दोनों नेता काफी गर्मजोशी के साथ एक—दूसरे से मिलते हैं। उनकी दोस्ती के इन लगभग तीन सालों में उनके ​बीच विभिन्न मुद्दों पर ‘लव-हेट रिलेशनशिप’ देखने को मिला है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत और अमेरिका के बीच खट्टी—मीठी दोस्ती नज़र आई क्योंकि कई मामलों पर भारत और अमेरिका का नज़रिया एक—दूसरे से अलग है। दो देशों के बीच किसी मुद्दे को लेकर मतभेद होना कोई गलत बात नहीं है। दुनिया में कोई भी देश चाहे कितने भी करीबी दोस्त क्यों ना हों, उनके बीच कुछ ना कुछ मतभेद चलते ही रहते हैं। यह स्वाभाविक सी बात है। भारत और अमेरिका के बीच भी यही स्वस्थ मतभेद या कहें कि दोनों देशों की खट्टी—मीठी दोस्ती अक्सर नज़र आती है।

अमेरिका और ईरान के बीच की रार किसी से छुपी नहीं है। अमेरिका सद्दाम हुसैन के समय से ही ईरान के खिलाफ रहा है। वह ईरान को आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रायोजक मानता है। किंतु भारत इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। अमेरिका चाहता है कि भारत ईरान से ज्यादा व्यापारिक संबंध न रखे, खासकर तेल की खरीदारी तो बिल्कुल न करे। लेकिन भारत अमेरिका की इस चाहत को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहा है, क्योंकि भारत का ईरान के साथ रिश्ता सिर्फ तेल की खरीद तक ही सी​मित नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध भी काफी गहरे हैं।

ईरान के अलावा रूस से रिश्तों को लेकर भी भारत और अमेरिका के बीच काफी मतभेद हैं। हाल ही में भारत ने रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली खरीदने का समझौता किया तो अमेरिका ने भारत को चेतावनी दी कि यदि भारत इस फैसले पर आगे बढ़ता है तो अमेरिका के साथ भारत के रक्षा संबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा। अमेरिका भारत पर ‘काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस’ एक्ट के तहत प्रतिबंध लगा सकता है। लेकिन भारत ने अमेरिका की इस चेतावनी को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया और इस डील पर वह आगे बढ़ रहा है। इतना नहीं, अमेरिका को भारत के फ्रांस और इजरायल से हो रहे रक्षा सौदों से भी परेशानी है। लेकिन भारत अपने हितों को सर्वोपरी रखते हुए आगे बढ़ रहा है।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन तेजी से अमेरिका का प्रतिद्वंद्वी बनता जा रहा है। अमेरिका जानता है कि मध्य एशिया में केवल भारत ही चीन को टक्कर दे सकता है। चीन सिल्क रूट के जरिए पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक पहुंचकर ग्लोबल कम्युनिटी में अपनी पकड़ और मजबूत बनाना चाहता है। चीन के इस कदम के जवाब में भारत का ईरान के चाबहार बंदरगाह तक पहुंचने का प्लान है। अमेरिका चाहता है कि चाबहार बंदरगाह को लेकर उसके और भारत के बीच ज्यादा विवाद न हो। ऐसे में ईरान को लेकर अमेरिका भारत को लगातार चेतावनियां तो देता रहता है लेकिन वह भारत पर ज्यादा दबाव नहीं बना पा रहा है।

अमेरिका चीन की तुलना में भारत से ज्यादा व्यापारिक समझौते करना चाहता है। पिछले दो वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार करीब 83.30 खरब रुपए से बढ़कर 98 खरब रुपए तक पहुंच गया है। ऊर्जा को लेकर भारत की चिंताओं को दूर करने के लिए अमेरिका ने 2017 में भारत में कच्चे तेल के निर्यात को 10 मिलियन बैरल से बढ़ाकर 2018 में 50 मिलियन बैरल कर दिया। इसे अमेरिका की नीति कहें या मजबूरी, लेकिन वह चीन के खिलाफ भारत को मजबूत करना चाहता है और इससे भारत को भी फायदा ही है। हालांकि चीन को लेकर भारत और अमेरिका की ​नीतियां अलग—अलग हैं। जहां अमेरिका चीन पर सीधे निशाना साधता है वहीं भारत सीधे तौर पर चीन पर निशाना नहीं साधता।

कुछ समय पहले ही अमेरिका ने विभिन्न मामलों में भारत पर दबाव बनाने के लिए भारत को अपनी व्यापारिक वरीयता की लिस्ट यानी जीएसपी से बाहर कर दिया था। यह एक ऐसी प्रणाली है जो विकासशील देशों को अमेरिका में अपने उत्पाद निर्यात करने पर लगने वाले शुल्कों में छूट देती है। यानी भारत से निर्यात किये गए उत्पादों पर अमेरिका में अब ज्यादा शुल्क लगेगा। अमेरिका के इस कदम के बाद भारत ने 29 अमेरिकी उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी बढ़ा दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी उत्पादों पर भारत के टैरिफ पर विरोध जताते रहे हैं।

भारत और अमेरिका के बीच तमाम मुद्दों को लेकर मतभेद हो सकते हैं लेकिन ये स्वस्थ मदभेद हैं, और स्तस्थ मतभेद की अ​हमियत भारत जैसे लोकतांत्रिक देश से बेहतर कौन समझ सकता है। रही बात मोदी और ट्रंप की दोस्ती की, तो दो व्यक्तियों के बीच की दोस्ती अपनी जगह है और दो राष्ट्रों के बीच के संबंध अपनी जगह। मोदी और ट्रंप व्यक्तिगत तौर पर चाहे जैसे भी दोस्ती निभाएं लेकिन जब बात देशहित की आएगी तो जाहिर तौर पर दोनों नेता अपने—अपने देश के हितों को सर्वोपरी रखकर ही कोई काम करेंगे।

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